हिन्दी दिवस पर विशेष (अँग्रेज़ी स्कूलों में हिन्दी की पुस्तक के आंसू )

राष्ट्रभाषा का आशियाना , सदियों से भारत का मस्तक हूँ ………|

मैं हिन्दी की पुस्तक हूँ ………………………………………..……| |

 

सैकड़ों सालों से नन्हे हाथों ने मुझे अपनाया ……………………..|

माँ-बाप ,भाई-बहन और ऋषियों ने भी मुझे गले लगाया ………| |

लेकिन आज प्यार की एक बूँद को तरसती हूँ ………….………..| |

मैं हिन्दी की पुस्तक हूँ ……………………………………….…..|

 

विदेशी आए शोतान लाये, घर छीना, गाँव छीना ………………...|

और अब देश की मिट्टी की खुशबू को तरसती हूँ ……..……...| |

मैं हिन्दी की पुस्तक हूँ ………………………………………..| |

 

अपने आज हुए पराये कुछ आज तो कुछ कल चले जायेंगे ....|

शायद अब लौट कर नहीं आयेंगे ……………………………….| |

मैं घर के कोने में पड़ी अपनों की एक झलक को तरसती हूँ...|

मैं हिन्दी की पुस्तक हूँ ………………………………………....|  

 

राष्ट्रभाषा का आशियाना , सदियों से भारत का मस्तक हूँ |

मैं हिन्दी की पुस्तक हूँ ………………………………………..| |

 

 

विजय-राज चौहान (गजब) 

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