रात के लगभग बारह बज चुके थे | बैलगाड़ी गाँव की तरफ चल रही थी ,हरिया , दीनू ओर पारो चुपचाप बैठे थे । उनके मन में अन्तःदुवंध चल रहा था । आकाश में कुछ -कुछ बादल छाने लगे थे जिसके कारण एक-एक दो-दो बून्दे भी आने लगी थी । हरिया शहर से बहार लगी आरा मशीन से कुछ पैसे देकर कुछ लकडियाँ बैलगाड़ी मे डलवा लेता है और थोडी देर में वे लोग गाँव पहुँच जाते है ।
गाँव से बहार शमशान घाट में जाकर हरिया बैलगाड़ी रोक देता है । वह लकडियाँ उठा कर चिता बनाने लगता है । पारो उसकी मदद् करती है लेकिन दीनू सिर नीचा किये बैलगाड़ी में बैठा रहता है । उसे अपने चारों तरफ की हल-चल से कोई सरोकार न था ।
पारो और हरिया फुलवा को चारपाई से उठा कर चिता पर लिटा देते है और फिर उस पर लकडियाँ रखने लगते है । हरिया दीनू को उठाता है । दीनू कि आँखों से आंसुओ कि धार बह रही थी, उसका घुटना दर्द कर रहा था । वह हरिया के कन्धे पर हाथ रखकर चलता है । पारो कुछ दूर पड़े फूस को उठा लाती है , वह फूस को दीनू के हाथों मे दे देती है। हरिया फूस को माचिस से आग लगाता है जिसके बाद दीनू कापते हाथों से चिता में अग्नि प्रवाहित करता है | वह वही जमीन पर बैठ जाता है । और अपनी भीगी निगाहों से फुलवा की चिता की आग को देखने लगता है |
चिता की लपटे आकाश को छू रही थी | दीनू के घर की बगिया बहार आने से पहले ही उजड़ चुकी थी, गरीबी की फिजा ने फूल खिलने से पहले ही उजाड़ दिया था |
कुछ देर में ही फुलवा का शरीर पांचों तत्वों में विलीन हो जाता है और चिता की आग भी छिपते सूरज की भांति धीमी हो जाती है |
हरिया दीनू की बांह पकड़ कर उसे उठाता है | दीनू हरिया के कंधे पर हाथ रखकर लंगडाते हुए चलता है और बैलगाड़ी में जाकर बैठ जाता है | पारो भी गाड़ी के एक कोने में बैठी थी |
कुछ देर में वे घर पहुँच जाते है | हरिया बैलो को खूंटे से बाँध देता है और दीनू को सहारा देकर छप्पर में पड़ी चारपाई पर लिटा देता है |
पारो अन्दर से हल्दी ओर घी लाकर आग पर पकाती है और दीनू के घुटने पर बाँध देती है | इस समय भोर हो चुकी थी ओर कुछ ही देर में सूरज निकलने वाला था |
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