दो दिन हो गए थे लेकिन दीनू ने अन्न का एक भी दाना मुँह में नही डाला था, वह अन्दर कोठे में पड़ा फुलवा की बाते सोच रहा था | रह-रहकर उसे फुलवा की यादें आ रही थी और दीनू के जख्मो में सुई की भांति चुभ जाती थी |
अचानक ही किवाड़ों में आवाज आती है | दीनू पलट कर देखता है तो हरिया हाथों में थाली लिए खड़ा था |
हरिया -”दीनू भइया ऐसे तो निभाव न होगा, दो दिन हो गए तुने अन्न का एक भी दाना मुंह में नहीं डाला, भला जो चले गए उनके साथ मरने से थोड़ा ही काम चलेगा, बैठो में खाना लाया हूँ खा लो |”
दीनू -”नहीं भैया मेरा खाने को मन नहीं कर रहा |”
हरिया -”मन कैसे नही कर रहा ,बैठ मैं खिलाऊंगा तुझे |”
हरिया दीनू की बांह पकड़ कर उसे बैठा देता है | वह चारपाई पर खाना रखकर बैठ जाता है और अपने हाथो से रोटी का एक कोर तोड़ कर उसके मुंह की तरफ़ बढ़ाता है |
दीनू मुंह फेर लेता है -”नहीं भैया मेरा नम नहीं कर रहा |”
हरिया -” देखा दीनू, बड़ा भैया मानता है तो खा ले वरना जीवन भर कभी नहीं बोलूँगा |”
हरिया की बात सुनकर दीनू मुंह खोलता है और रोटी का कोर खाने लगता है | इस समय रोटी का कोर उसे नीम के पत्तो की भांति कड़वा लग रहा था | वह एक रोटी खाकर ही खाना रख देता है | – “बस भैया और न खाया जाएगा |”
हरिया -”ठीक है अपनी चारपाई उठाओ और मेरे पास चलो हमारे पास रहना |”
- “नहीं भैया |”
हरिया- ” मै जैसा कहता हूँ वैसा करो, उठो जल्दी |”
हरिया ने इतना कहा और वह दीनू के कपड़े आदि समान लेकर आगे चल देता है | दीनू भी चारपाई लेकर उसके पीछे चल देता है |
आँगन में जाकर दीनू चारपाई बिछा कर बैठ जाता है | हरिया हुक्का भर लाता है और हुक्का गुड-गुडाने लगता है | दीनू भी मरे मन से एक दो दम लगता है | पारो भारत को ले आती है और वह उसे दीनू के पास बैठा देती है | दीनू भारत को गोद में बैठा लेता है | छोटा बालक भारत दीनू की तरफ़ मुंह करके मुसकुराता है तो दीनू का सारा दुःख दूर हो जाता है | वह बालक को खिलने लगता है |
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