तुम कुत्ते के मुँह की इस हड्डी को इसके मुँह में भी देना चाहते हो |

लगभग पाँच साल बीत जाते है | समय की मरहम और पारो,हरिया के प्यार ने दीनू के जख्मो को भर दिया था | बालक भारत भी अब काफी बड़ा हो गया था | हरिया और दीनू आंगन में बैठे हुक्का पी रहे थे | पारो आती है, भारत भी नन्हे क़दमों से उसके पीछे दौड़ता हुआ आता है |

पारो -” क्यों जी मुन्ना काफी बड़ा हो गया है, इसे अब पाठशाला भेजना चाहिए|”

अरे पाठशाला भेज कर कौन सा बारिस्टर बनाओगी ,इसकी खेलने खाने की उम्र है,रहने दो इसे क्यों इसके नन्हे सर पर किताबों का बोझ डालना चाहती हो तुम”-हरिया धुआँ निकलता हुवा बोला |

पारो (दीनू से )-”तुम्ही कुछ कहो न भैया,मैं तो इनसे कई बार कहा चुकी हूँ |”

दीनू-”अरे हरिया किया तुम्हारी मति मारी गई है | जो बालक को पढ़ने से रोक रहे हो,तुम अपना हाल नहीं देखा रहे हो किया,क्या तुम अपनी ही तरह इसकी हालत करना चाहते हो |”

हरिया -”अरे बालक है | क्यों परेशान करते हो इसे | हमारे बाद अपनी खेती को देखेगा |”

दीनू -”अच्छा तो तुम कुत्ते के मुँह की इस हड्डी को इसके मुँह में भी देना चाहते हो ,अरे देखते नहीं इस खेती ने हमारी-तुम्हारी किया हालत बना दी है | मुश्किल से पैंतीस का हुआ हूँगा लेकिन पैंतालीस से कम कोई नहीं बताता | यदि पढ़ लिख कर कही शहर में रहे होते तो ये हालत न होती |”

हरिया -”ठीक है जैसा तुम दोनों चाहो वैसा करो |”

पारो -”भैया तुम ही ले जाओ इसे पाठशाला में ,ये न जायेंगे |”

दीनू-”ठीक है,बिटवा जरा यहाँ तो आओ |”

भारत दौड़कर आता है ,दीनू उसे बांहों में उठा लेता है और कंधे पर बैठा कर पाठशाला की तरफ़ चल देता है |

पाठशाला में मास्टरजी बैठे उंग रहे थे ,कुछ बालक आपस में झगड़ रहे थे तो कुछ दूर बैठे पढ़ रहे थे |पाठशाला में चार मास्टर थे लेकिन कभी एक आता था तो कभी दो,पूरे तो कभी न आते थे |भ्रष्टाचार ने इन्हें भी अपने रंग में रंग लिया था |

“मास्टरजी,ओ मास्टरजी “-दीनू ने पाठशाला में घुसते ही आवाज लगाई|

मास्टरजी (चौक कर बैठते हुए )-”अरे आओ दीनू,आओ तुमने तो मुझे डरा ही दिया |”

दीनू-”भला हम कौन होते है आपको डरा ने वाले ,आप राजा हम रंक|”

मास्टरजी -”अरे नही ऐसा न कहो,सुनाओ कैसे आना हुआ |”

दीनू-”सुनाये किया ये हमारा बिटुआ है आप इसे भी स्कूल में भर्ती कर लो |”

मास्टरजी- “ठीक है, बेटा क्या नाम है तुम्हारा |”

“भारत”-बालक ने तुतलाती आवाज में कहा |

मास्टरजी-”क्यों दीनू क्या यही नाम है इसका ?”

दीनू -”जी हाँ “भारत” पिता का नाम हरिया |

मास्टरजी ठीक है मैंने नाम लिख लिया है ,कल से इसे स्कूल में भेज देना ,कल में इसकी किताब भी ला दूंगा |”

दीनू – “जी ठीक है,अच्छा नमस्ते |”

-”नमस्ते |”

दीनू बालक को लेकर घर आ जाता है और अगले दिन से उसे स्कूल भेजना शुरू कर देते है |

<<पीछेउपन्यास (भारत /India) से-(लेखक-विजय-राज चौहान) आगे >>

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