“कन्हैया”…..!(कहानी)

April 17, 2009

    poor-lady मीरा अपनी झोंपड़ी में बैठी गहरी सोच में डूबी हुई थी | आज उसे अपने स्वर्गवासी पति की बड़ी याद आ रही थी | कन्हैया जब एक साल का था जब उनका इंतकाल हो गया था | वह सोच रही थी कि यदि आज वह जिंदा होते तो कन्हैया इतना जिद्दी और आवारा न होता, सारा दिन घर से बाहर रहता है | पता नहीं स्कूल में जाता भी है या नहीं | सोचती हूँ कल मास्टरजी से बात करुँ कि कुछ पढ़ता भी है या नहीं |

     लेकिन आज तो शाम होने को आयी घर ही नहीं आया | सुबह जरा सा किया डाट दिया अभी तक घर नहीं लौटा | अँधेरा हो चला था, मीरा को अब चिंता होने लगी थी | वह चारपाई से उठाती है और अपनी छड़ी उठा कर झोंपड़ी से बाहर निकल कर कन्हैया को आवाज लगाती है | कन्हैया………………………..ओ कन्हैया……………………..|

     पडोसिन का दरवाजा खटखटाया -”बहन मेरे कन्हैया को देखा है किया ?” -”वहाँ मन्दिर के पास देखा था, जा कर देख लो”-पडोसिन ने नाक भौ सिकोड़ते हुए कहा |

     मीरा मन्दिर की तरफ चल देती है | मन्दिर थोडी दूर था जाकर देखा तो कन्हैया मन्दिर की सीढियो पर ठण्ड से सिकुड़ा बैठा था | वह अभी भी ग़ुस्से में नजर आ रहा था | उसे मीरा की आवाज सुनाई दे रही थी लेकिन वह घुटनों में सिर गडाए चुपचाप बैठा था |

मीरा छड़ी टेकते हुए उसके पास पहुँचती है | दुलार से उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोली -”बेटा घर चल ठण्ड होने लगी है और तुने खाना भी तो नहीं खाया |”

कन्हैया मीरा का हाथ दूर हटाते हुए झुंझलाकर बोला -”नहीं तुम जाओ मैं नहीं आऊँगा |”

मीरा दुलार करते हुए बोली -”नहीं बेटा घर चलो मैंने तुम्हारे लिए बाजरे की रोटी बनाई है |”

-”नहीं जाऊँगा तुम मुझे डाटती हो|” -”नहीं आगे नहीं डाटूंगी|” कन्हैया मीरा का हाथ हटाता है और घर की तरफ़ चल देता है |मीरा भी अपनी छड़ी टेकते हुए उसके पीछे – पीछे चल देती है |

मीरा रोटी लेकर आती है -”ले बेटा खाना खा ले|”

-”नहीं खाऊंगा|” इतना कह कर कन्हैया अपनी चारपाई की फटी चद्दर में घुसकर सो जाता है |

मीरा खाना वही रख देती है उसे पता था कि वह रात को उठ कर अपने आप खा लेगा और वह भी अपनी चारपाई पर जाकर सो जाती है |

सुबह हुई तो मीरा चारपाई से उठते हुए कन्हैया को जगती है जो अभी तक औंधे मुँह सोये पड़ा था लेकिन उसकी खाने कि थाली खाली थी | कन्हैया उठ कर बहार कुऐ पर नहाने चला जाता है | लेकिन वह मीरा से बात नहीं करता |मीरा तब तक उसके लिए खाना और उसका बस्ता तैयार करती है | कन्हैया आता है और कपड़े पहनकर, थोड़ा कुछ खाकर स्कूल की तरफ चल देता है |

मीरा उसे दूर तक जाते हुए देखती है | उसे आज अपने शरीर में ज्वर पीड़ा महसूस हो रही थी | लेकिन उससे ज्यादा माँ के दुखी दिल की पीड़ा ज्यादा थी, उसकी आँखों से आंसू छलक आये थे | दोपहर के समय में मीरा में सोचा शरीर में ज्वर की पीड़ा हो रही हे तो डॉक्टर के यहाँ से होते हुये कन्हैया के स्कूल तक भी चलती हूँ ।वह अपनी छड़ी उठाती हे ओर पास के डॉक्टर के यहाँ चल देती है ।

डॉक्टर ने मुआयना करते हुये कहा -”अम्मा खाँसी कब से है “

मीरा -”बेटा महीना भर हो गया आज तो ज्वर से शरीर भी तप रहा हे”

डॉक्टर -”अम्मा १००/रू जमा करा दो जाँच करनी पडेगी”

मीरा अपनी फटी जेब टटोलती हे सारे मिलाकर २० रू थे। मीरा ने कापते हाथों से पैसे डॉक्टर साहब की तरफ बढ़ते हुए कहा -”बेटा मेरे पास तो यही है |”

डॉक्टर झुँझलाते हुए -”पैसे नहीं तो यहाँ क्यों आयी ?जब पैसे होंगे तो आना|” मीरा अपने टूटे क़दमों से बहार की तरफ चल देती है | उसकी आंखें नम थी वह अपनी टूटी छड़ी को टेकते हुए स्कूल पहुँचती है |

मास्टर जी कुर्सी पर बैठे मीठी धूप में उंग रहे थे | उनके चारों तरफ़ बैठे कुछ बच्चे आपस में कुछ छीना झपटी कर रहे थे तो कुछ कागज की पतंग बना रहे थे मीरा ने नजर दौडायी लेकिन उसे कन्हैया कही नहीं दिखाई देता उसका बूढ़ा दिल चिंता से जाता है | वह छड़ी टेकते हुए तेजी से मास्टर जी के पास पहुँचती है |

-”मास्टर जी ………..,मास्टर जी नमस्ते !”-मीरा ने अपनी खांसी को रोकते हुए जोर से आवाज लगाई | मास्टर जी (चौंकते हुए )-”अरे मीरा कहो कैसे आना हुआ |”

-”मास्टर जी कन्हैया कँहा है” -मीरा ने अपनी बूढी आवाज में याचना सी करते हुए पूछा |

-”कन्हैया………..,कन्हैया तो चार दिन से स्कूल ही नहीं आया ,मैंने सोचा शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं होगी |”

मीरा ने सुना तो उसे पैरो तले की जमीन धसती नजर आयी, उसका बूढ़ा दिल व्याकुल हो उठा वह अपनी छड़ी को टेकते हुए स्कूल से बहार की तरफ़ दौडी |

उसने स्कूल के चारों तरफ़ देखा लेकिन उसे कन्हैया कही दिखाई नहीं देता | वह मन्दिर की तरफ़ दौडी लेकिन मन्दिर का चबूतरा भी खाली था |

मीरा मन्दिर से वापस मुड़ी तो उसने गुन्नू को चौपाल की तरफ़ जाते देखा, गुन्नू कन्हैया की कक्षा में ही पढ़ता था लेकिन शायद ही वह कभी स्कूल में जाता था उसका बापू गाँव के पास ईट के भट्टे पर ठेकेदार का काम करता था इसलिए घर में दो पैसे अच्छे आते थे | मीरा गुन्नू के पीछे चौपाल की तरफ़ चल देती है |

वह अंदर पहुंची तो उसकी बूढी आँखे फटी की फटी रहा गयी | कन्हैया गुन्नू के साथ बैठा बीड़ी पी रहा था | मीरा ने यह देखा तो उसे अपने दिल में सैकड़ों सुई या एक साथ चुभती नजर आयी | वह क्रोध से तिल मिला उठी उसने नीचे बैठे कन्हैया के ऊपर अपनी छड़ी से वार पर वार कर डाले | ऐसा लग रहा था मानो मीरा क्रोध से पागल हो गयी हो |

कन्हैया ने अचानक आयी इस मार की आंधी को देखा तो वह डर गया | उसके हाथ की बीड़ी दूर जा गिरी और वह मीरा हो धक्का देते हुए वहाँ से भाग गया | गुन्नू भी उससे आगे सिर पर पैर रख कर भागा | मीरा वही पड़ी रह जाती है | उसके हाथ की छड़ी भी दूर जा गिरी थी, वह रोये जा रही थी, बूढ़े आंसुओ से उसका कुरता गीला हो गया था | वह वही बैठ जाती है, आज उसे कन्हैया के बापू की सबसे ज्यादा याद आ रही थी लेकिन जिंदगी के इस बूढ़े सफर में वह बिल्कुल अकेली थी |

उसे आज अपना सब कुछ लुटता नजर आ रहा था | वह अपने टूटे हाथों से अपनी धूल में पड़ी छड़ी को उठाती है और लुटे क़दमों से अपनी झोंपड़ी की तरफ़ चल देती है घर पहुंच कर वह अपनी चारपाई पर गिर पड़ती है और अपनी बूढी आँखों को बंद करते हुए निराशा के समुन्द्र में डूब जाती है | लेकिन उसकी आँखों के आंसू अब भी एक दूसरे की पूँछ पकड़े लगातार बहे जा रहे थे |

अँधेरा छाने को आया था लेकिन कन्हैया अब भी मन्दिर के चबूतरे के पीछे वाली सीढियों पर अपना सिर टाँगों के बीच में छुपाये बैठा था | ठण्ड के कारण उसका शरीर सिकुड़ता जा रहा था लेकिन शायद वह कोई मन में दृढ़ निश्चय किऐ वही पड़ा था और वही सो जाता है |

सुबह जब कन्हैया की आंखें खुली तो सूरज काफी ऊँचे चढ़ चुका था | उसे भूख लगी थी | वह घर की तरफ़ चलता है लेकिन कुछ सोच कर वह रुक जाता है | वह मुड कर गुन्नू के घर की तरफ़ चल देता है गुन्नू जाग चुका था और खाना खा रहा था |

कन्हैया ने बहार से आवाज लगाई | -”गुन्नू ……………गुन्नू …………….|” गुन्नू ने कन्हैया की आवाज सुनी तो दौडा आया देखा तो दरवाजे पर कन्हैया खड़ा था |

उसने धीरे से पूछा -”कन्हैया………..तू यहाँ ….|”

कन्हैया दीन आँखों से गुन्नू को देखते हुए बोला -”गुन्नू मुझे भूख लगी है कुछ खाने को दो ना….|”

-”नहीं कन्हैया तुम घर जाओ”-मम्मी से डरते हुए गुन्नू ने कहा | -”नही गुन्नू मुझे भूख लगी है”

-कहते हुए कन्हैया दरवाजे से अंदर घुसता है |

लेकिन गुन्नू बीच में ही कन्हैया को पकड़ लेता है बोला -”नहीं कन्हैया तुम अपने घर जाओ”| इतना कह कर गुन्नू कन्हैया को दरवाजे से बहार कर देता है और अन्दर से दरवाजा बंद कर लेता है |

कन्हैया बहार खडा रह जाता है उसे आज किस्मत के सारे दरवाजे बंद होते नजर आ रहे थे | वह अपने भूखे नन्हे क़दमों से बहार की तरफ़ चल देता है | वह एक बार फिर अपने घर की तरफ़ चल देता है लेकिन अचानक फिर गाँव से बहार जाने वाले रस्ते पर मुड जाता है |

कई दिनों से आसमान साफ़ था लेकिन अचानक ही कुछ बादल से घिर आए थे और हल्की-हल्की बूंदे आनी शुरू हो गयी थी | लेकिन कन्हैया अपने ही विचारों में खोया हुआ अपने भूखे क़दमों से आगे बढ़ा चला जा रहा था | वह गाँव से काफी दूर निकल आया था | अचानक बारिश तेज हो जाती है कन्हैया को तो मानो अभी होश आया हो | उसने चारो तरफ़ नजरे उठा कर देखा तो चारो तरफ़ जंगल था | वह सिर छिपाने की जगह ढूँढ़ता है तो उसे दूर एक छप्पर सा नजर आता है | वह उसकी तरफ़ दौड़ पड़ता है | छप्पर के पास पहुँच कर कन्हैया एक पेड़ के नीचे रुक जाता है | उसने दूर से देखा की छप्पर के अंदर एक ऊँचे चबूतरे पर एक बड़ी दाढी वाला व्यक्ति कुछ गेरूए से वस्त्र धारण किए हुए बैठा था | उसके सामने नीचे कुछ उसके शिष्य भी बैठे हुए थे | यह कोई आश्रम सा दिखाई दे रहा था | कन्हैया वही पेड़ के नीचे खडा हो जाता है और वही से गुरु शिष्यों के वार्तालाप को सुनने लगता है |

एक शिष्य ने खड़े होते हुए पूछा -”गुरु जी मनुष्य का प्रथम गुरु कोंन होता है |” -”बालक की प्रथम गुरू उसकी माता होती है “- गुरूजी शांत भाव से बोले | शिष्य -”लेकिन गुरूजी माँ तो माँ होती है वह प्रथम गुरू कैसे हो सकती है |”

-”क्योकि पुत्र एक माता ही सर्वप्रथम जन्म के बाद किसी प्राणी को धुप-छाँव,कड़वे-मीठे और अच्छे-बुरे का ज्ञान कराती है और जो प्राणी जन्म के बाद प्रथम ज्ञान प्रदान करता है वही प्रथम गुरू भी होता है | पुत्र ! माता समस्त गुरूओ और देवो में श्रेष्ठ है और इस बात का प्रमाण हमारे शास्त्र भी देते है जिनमे कहा गया है कि – “मात्र देवो भावः , पितृ देवो भावः ” इसके अलावा पुत्र इस बात का इतिहास भी प्रमाण देता है – श्रवण कुमार ने अपने माता पिता कि पूर्ण सेवा की और उन्हें कंधे पर लेकर सभी पवित्र धामों कि यात्रा कराई, इसलिए हे पुत्र कभी माता का निरादर और तिरिस्कार नही करना चाहिए |”

पेड़ के नीचे खड़ा कन्हैया ये सब सुन रहा था | अचानक आयी इस ज्ञान कि बरसात ने उसके मन के दर्पण पर जमी अज्ञान- की धूल को पूर्ण रूप से धो दिया था और उसका मन ज्ञान के प्रकाश से जगमगा उठा था | उसे अपने ऊपर घ्रणा हो रही थी, उसका गला पीडा से रूंध गया और उसकी आँखों से पश्च्याताप के आंसू बह निकले | उसका मन अभी अपनी माँ से मिलने के लिए तड़प उठा |

वह गाँव की तरफ़ वाले रस्ते पर वापस दौड़ पड़ता है | भारी बारिश में भी उसके पैर जमीन पर ऐसे पड़ रहे थे मानो की किसी गर्म तवे पर पड़ रहे हो | जो पैर अभी तक भूख के कारण निर्जान से हुए जा रहे थे उनमे अचानक अपार शक्ति आ गयी थी और वो किसी आंधी की तरह से घर की तरफ़ बढ़े जा रहे थे | तूफ़ान की भांति कन्हैया झोपडी के दरवाजे को खोलते हुए झोपडी के अन्दर पंहुचता है | लेकिन शायद अब काफ़ी देर हो चुकी थी | मीरा शून्य अवस्था में अपनी चारपाई पर पड़ी थी | उसका शरीर बेजान हो चुका था |

कन्हैया मीरा को कई बार पुकारता है -” माँ…………..माँ देखो में आ गया, में आज के बाद कभी बीडी नही पीऊँगा और हर रोज स्कूल जाऊंगा, माँ में तेरी हर बात मानूंगा, माँ तू बोलती क्यो नही “| कन्हैया रोये जा रहा था और विलाप किये जा रहा था | वह रोते हुए मीरा के पैरो पर गिर पड़ता है | लेकिन मीरा अब भी उसी अवस्था में आँखे बंद किये अपनी चारपाई पर पड़ी थी, उसका शरीर ठंडा पड़ चुका था |

कन्हैया को आज अपना सब कुछ लुटता नजर आया, इस दुःख भरे संसार में आज बिल्कुल अकेला हो गया था | अचानक ही वह उठता है और मन्दिर की तरफ़ दौड़ पड़ता है | वह मन्दिर के घंटे को जोर-जोर से बजाने लगता है और कभी न मानने वाले भगवान के सामने अपनी माँ के जीवन के लिए सैकड़ों दुआए माँगता है |

वह मन्दिर के घंटे को बजाए जा रहा था और आंसू बाहें जा रहा था, दर्द के आंसुओ से उसका गला और आँखें रूँध गयी थी और अचानक ही वह मूर्छित होकर मन्दिर के फ़र्श पर गिर पड़ता है | कुछ देर बाद जब कन्हैया की आँखें खुली तो उसने अपने आप को मीरा की गोद में पाया, मीरा अपने पल्लू से उसके गीले मुंह को सुखा रही थी |

कन्हैया ने माँ को सामने पाया तो वह खुशी से झूम उठा और मीरा के आँचल से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगता है -”माँ तुम कंहा चली गयी थी”| मीरा भी कन्हैया को अपने आँचल में छुपा लेती है | ऐसा लग रहा था मनो नन्हे दिल की सच्ची याचना को भगवान ने सुन लिया था और मीरा के निर्जान शरीर में एक बार फिर जान डाल दी थी |

मीरा कन्हैया को घर ले आती है और खाना खिलाती है कन्हैया भी माँ के इस प्रेम से भरे मीठे खाने को जी भरकर खाता है | वह सुबह से भूखा था, खाना खाकर कन्हैया सो जाता है | अगले दिन सुबह वह जल्दी उठता है और नहाकर सबसे पहले बस्ता उठा कर स्कूल की तरफ़ चल देता है | मीरा उसे दूर तक जाते हुए देखती है | उसकी बूढी आँखें सैकड़ों याचनाओ के साथ ऊपर आसमान की तरफ उठ जाती है शायद भगवान ने उसके भटके पुत्र को सही रास्ता दिखा दिया था |

लेखक – विजय-राज चौहान “ग़ज़ब”


गाँव के आवारा कुत्ते भी ठण्ड से बचने के लिए कही जा छुपे थे |

March 8, 2009

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पूस महीने की कड़के की ठण्ड पड़ रही थी | गेहूँ जमकर काफी बड़े हो गए थे, उनमें अब कोर लगने का समय आ गया था | नहर में पानी आ रहा था, इसलिए लोग अपने गेहूँ में पानी लगा रहे |

आज रात हरिया का भी पानी लगने का नंबर था | रात के बारह बजे से सुबह के तीन बजे तक हरिया के पानी का समय था, इसलिए हरिया काफी दिन से ही पानी पर जाने की तैयारी कर रहा था | वह लालटेन में तेल डालता है और उसकी चिमनी पानी से धो कर साफ़ करता है, दो फावड़े बहार रखता है एक उपला और लाठी भी रखता है |

शाम हो गयी थी, पारो खाना पकाने लगती है, दीनू बेलों और गायें को चारा डालता है | हरिया बैठा हुक्का पी रहा था, छोटा बालक भारत भी पारो के पास बैठा खाना खा रहा था |

पारो खाना बनाकर खाना परोस देती है तो हरिया और दीनू भी खाना खा लेते है | इसके बाद दीनू चिलम उठाकर उसे भरता है और हुक्के में पानी डालता है |

रात के लगभग नो बज गाये थे दीनू और हरिया बैठे हुक्का पी रहे थे, दीनू हुक्का पीकर लेट जाता है उसे नींद लग गयी थी | हरिया बैठा हुक्का पी रहा था | कुछ देर बाद वह बहार निकल कर आसमान की तरफ तारों की दिशा देखता है | लगभग साढ़े दस या ग्यारह का समय हुआ होगा, वह अन्दर जाता है और दीनू को खेत चलने के लिए जागता है | दोनों अपनी-अपनी चद्दर ओढ़कर खेत की तरफ चल देते है |हरिया लालटेन हाथ में लिए और कंधे पर फावडा लिये आगे चलता है तो एक हाथ में उपला लाठी लिए और कंधे पर फावड़ा लिये दीनू उसके पीछे चलता है |

गली यों में सन्नाटा छाया हुआ था, ठंडी हवा चल रही थी | गाँव के आवारा कुत्ते भी ठण्ड से बचने के लिए कही जा छुपे थे | टेढी- मेढ़ी खेत की पग डँड़ियों से होते हुए वों दोनों खेत पहुंच जाते है | हरिया नाली पर पंहुचता है, पानी पड़ोस के खेत में चल रहा था और वह पीछे नाली को नहर तक देखने गया था | हरिया वापस आ जाता है | वह जेब से माचिस निकल कर ईख की पत्ती से उपले में आग लगा ता है तो दीनू ईख के झुंड में रखे हुक्के को उठा लाता है | कुछ देर बाद उपले जल कर आग हो जाती है तो दीनू चिलम भर देता है और वे दोनों हुक्का पीने लगते है |

दोनों मित्र बैठे हुक्का पी रहे थे तो कुछ देर बाद लालटेन की धुंध ली रोशनी में दूर नाली पर उन्हें कोई व्यक्ति दिखाई देता है जो उन्हीं की तरफ आ रहा था | वह खेत का पड़ोसी गणेशी था जो नाली पर चक्कर लगा कर आया था |

<<पीछे उपन्यास (भारत /India) से-(लेखक-विजय-राज चौहान)