नन्हा बालक माँ -बाप की वास्तविक ममता से वंचित था |

February 15, 2009

*************

अलार्म घड़ी की आवाज आई तो रूबिया ने अल साई आँखों से उसका स्विच ऑफ कर दिया | उसने देखा तो खिड़की से होकर सूर्य का मंद-मंद प्रकाश भी कमरे में आ रहा था | वह चड्ढा साहब के पास से उठती है और दरवाजा खोलते हुए सुखिया को आवाज लगाती है |

-”सुखिया”

-”जी मेम साहब” (सुखिया नीचे झाडू लगा रही थी )

-”चंदन को जगा कर उसे जल्दी तैयार कर दो,स्कूल को देर हो रही है”

-”जी अच्छा “

सुखिया झाडू लगाकर ऊपर आती है और चंदन को जगती है | वह चंदन को नहला कर कपड़े पहना देती है और नाश्ता बनाने चली जाती है | नाश्ता बनाकर वह चंदन को खिलाती है और कुछ उसके बॉक्स में रखकर उसके बैग में रख देती है |

ड्राइवर चंदन को बैठा कर स्कूल छोड़ आता है | चंदन एश्वर्या के स्कूल में ही पढ़ता था | शहर के अच्छे – अच्छे घरानों के बच्चे यहाँ पढ़ते थे, इंग्लिश मीडियम स्कूल था,राष्ट्र-भाषा का नाममात्र को भी ज्ञान नहीं कराया जाता था | एश्वर्या भी अब काफी बड़ी हो गई थी,वह भी अब चौथी क्लास की स्टुडेंट थी |

स्कूल की घंटी बजी तो सभी बच्चे अपने-अपने बैग उठा कर बहार दौड़ते है | किसी की मम्मी किसी का पापा तो किसी का भाई या बहन उन्हें लेने आया था | चंदन भी अपना बैग उठता है और सिर नीचा किए बहार दरवाजे की तरफ़ चल देता है,वह उदास नजर आ रहा था | बहार आकर वह गाड़ी में बैठ जाता है तो ड्राइवर गाड़ी लेकर गर आ जाता है और उसे उतर कर फिर ऑफिस चला जाता है |

सुखिया उसे खाना खिलाती है फिर वह अपना होमवर्क पूरा करता है और एश्वर्या के पास खेलने चला जाता है | शाम को फिर वह आता है और खाना खाकर सो जाता है | वह नन्हा बालक माँ -बाप की वास्तविक ममता से वंचित था,प्यार की एक बूँद पाने के लिए वह तरस रहा था | लेकिन रूबिया और चड्ढा साहब अपने कारोबार में व्यस्त थे |

लगभग दस बजे रूबिया आती है | कुछ देर बाद चड्ढा साहब भी आ जाते है | सुखिया मेज पर खाना परोस देती है |

रूबिया-”सुखिया”

-”जी मेम साहब”

-”चंदन से खाना खाया की नही |”

-”जी हाँ |”

-”और होमवर्क भी पूरा किया था या नही |”

-”जी वह भी कर लिया था |”

-”ठीक है |”

इसके बाद खाना खाकर वे दोनों अपने कक्ष में चले जाते है कुछ देर बाद चड्ढा साहब भी आ जाते है | केबल पर फ़िल्म आ रही थी रूबिया टी. वी ऑन करती है |

सुखिया भी बर्तन उठती है और फिर सोने चली जाती है |

<<पीछे - उपन्यास (भारत /India) से-(लेखक-विजय-राज चौहान) आगे>>


तुम कुत्ते के मुँह की इस हड्डी को इसके मुँह में भी देना चाहते हो |

January 11, 2009

लगभग पाँच साल बीत जाते है | समय की मरहम और पारो,हरिया के प्यार ने दीनू के जख्मो को भर दिया था | बालक भारत भी अब काफी बड़ा हो गया था | हरिया और दीनू आंगन में बैठे हुक्का पी रहे थे | पारो आती है, भारत भी नन्हे क़दमों से उसके पीछे दौड़ता हुआ आता है |

पारो -” क्यों जी मुन्ना काफी बड़ा हो गया है, इसे अब पाठशाला भेजना चाहिए|”

अरे पाठशाला भेज कर कौन सा बारिस्टर बनाओगी ,इसकी खेलने खाने की उम्र है,रहने दो इसे क्यों इसके नन्हे सर पर किताबों का बोझ डालना चाहती हो तुम”-हरिया धुआँ निकलता हुवा बोला |

पारो (दीनू से )-”तुम्ही कुछ कहो न भैया,मैं तो इनसे कई बार कहा चुकी हूँ |”

दीनू-”अरे हरिया किया तुम्हारी मति मारी गई है | जो बालक को पढ़ने से रोक रहे हो,तुम अपना हाल नहीं देखा रहे हो किया,क्या तुम अपनी ही तरह इसकी हालत करना चाहते हो |”

हरिया -”अरे बालक है | क्यों परेशान करते हो इसे | हमारे बाद अपनी खेती को देखेगा |”

दीनू -”अच्छा तो तुम कुत्ते के मुँह की इस हड्डी को इसके मुँह में भी देना चाहते हो ,अरे देखते नहीं इस खेती ने हमारी-तुम्हारी किया हालत बना दी है | मुश्किल से पैंतीस का हुआ हूँगा लेकिन पैंतालीस से कम कोई नहीं बताता | यदि पढ़ लिख कर कही शहर में रहे होते तो ये हालत न होती |”

हरिया -”ठीक है जैसा तुम दोनों चाहो वैसा करो |”

पारो -”भैया तुम ही ले जाओ इसे पाठशाला में ,ये न जायेंगे |”

दीनू-”ठीक है,बिटवा जरा यहाँ तो आओ |”

भारत दौड़कर आता है ,दीनू उसे बांहों में उठा लेता है और कंधे पर बैठा कर पाठशाला की तरफ़ चल देता है |

पाठशाला में मास्टरजी बैठे उंग रहे थे ,कुछ बालक आपस में झगड़ रहे थे तो कुछ दूर बैठे पढ़ रहे थे |पाठशाला में चार मास्टर थे लेकिन कभी एक आता था तो कभी दो,पूरे तो कभी न आते थे |भ्रष्टाचार ने इन्हें भी अपने रंग में रंग लिया था |

“मास्टरजी,ओ मास्टरजी “-दीनू ने पाठशाला में घुसते ही आवाज लगाई|

मास्टरजी (चौक कर बैठते हुए )-”अरे आओ दीनू,आओ तुमने तो मुझे डरा ही दिया |”

दीनू-”भला हम कौन होते है आपको डरा ने वाले ,आप राजा हम रंक|”

मास्टरजी -”अरे नही ऐसा न कहो,सुनाओ कैसे आना हुआ |”

दीनू-”सुनाये किया ये हमारा बिटुआ है आप इसे भी स्कूल में भर्ती कर लो |”

मास्टरजी- “ठीक है, बेटा क्या नाम है तुम्हारा |”

“भारत”-बालक ने तुतलाती आवाज में कहा |

मास्टरजी-”क्यों दीनू क्या यही नाम है इसका ?”

दीनू -”जी हाँ “भारत” पिता का नाम हरिया |

मास्टरजी ठीक है मैंने नाम लिख लिया है ,कल से इसे स्कूल में भेज देना ,कल में इसकी किताब भी ला दूंगा |”

दीनू – “जी ठीक है,अच्छा नमस्ते |”

-”नमस्ते |”

दीनू बालक को लेकर घर आ जाता है और अगले दिन से उसे स्कूल भेजना शुरू कर देते है |

<<पीछेउपन्यास (भारत /India) से-(लेखक-विजय-राज चौहान) आगे >>