अलार्म घड़ी की आवाज आई तो रूबिया ने अल साई आँखों से उसका स्विच ऑफ कर दिया | उसने देखा तो खिड़की से होकर सूर्य का मंद-मंद प्रकाश भी कमरे में आ रहा था | वह चड्ढा साहब के पास से उठती है और दरवाजा खोलते हुए सुखिया को आवाज लगाती है |
-”सुखिया”
-”जी मेम साहब” (सुखिया नीचे झाडू लगा रही थी )
-”चंदन को जगा कर उसे जल्दी तैयार कर दो,स्कूल को देर हो रही है”
-”जी अच्छा “
सुखिया झाडू लगाकर ऊपर आती है और चंदन को जगती है | वह चंदन को नहला कर कपड़े पहना देती है और नाश्ता बनाने चली जाती है | नाश्ता बनाकर वह चंदन को खिलाती है और कुछ उसके बॉक्स में रखकर उसके बैग में रख देती है |
ड्राइवर चंदन को बैठा कर स्कूल छोड़ आता है | चंदन एश्वर्या के स्कूल में ही पढ़ता था | शहर के अच्छे – अच्छे घरानों के बच्चे यहाँ पढ़ते थे, इंग्लिश मीडियम स्कूल था,राष्ट्र-भाषा का नाममात्र को भी ज्ञान नहीं कराया जाता था | एश्वर्या भी अब काफी बड़ी हो गई थी,वह भी अब चौथी क्लास की स्टुडेंट थी |
स्कूल की घंटी बजी तो सभी बच्चे अपने-अपने बैग उठा कर बहार दौड़ते है | किसी की मम्मी किसी का पापा तो किसी का भाई या बहन उन्हें लेने आया था | चंदन भी अपना बैग उठता है और सिर नीचा किए बहार दरवाजे की तरफ़ चल देता है,वह उदास नजर आ रहा था | बहार आकर वह गाड़ी में बैठ जाता है तो ड्राइवर गाड़ी लेकर गर आ जाता है और उसे उतर कर फिर ऑफिस चला जाता है |
सुखिया उसे खाना खिलाती है फिर वह अपना होमवर्क पूरा करता है और एश्वर्या के पास खेलने चला जाता है | शाम को फिर वह आता है और खाना खाकर सो जाता है | वह नन्हा बालक माँ -बाप की वास्तविक ममता से वंचित था,प्यार की एक बूँद पाने के लिए वह तरस रहा था | लेकिन रूबिया और चड्ढा साहब अपने कारोबार में व्यस्त थे |
लगभग दस बजे रूबिया आती है | कुछ देर बाद चड्ढा साहब भी आ जाते है | सुखिया मेज पर खाना परोस देती है |
रूबिया-”सुखिया”
-”जी मेम साहब”
-”चंदन से खाना खाया की नही |”
-”जी हाँ |”
-”और होमवर्क भी पूरा किया था या नही |”
-”जी वह भी कर लिया था |”
-”ठीक है |”
इसके बाद खाना खाकर वे दोनों अपने कक्ष में चले जाते है कुछ देर बाद चड्ढा साहब भी आ जाते है | केबल पर फ़िल्म आ रही थी रूबिया टी. वी ऑन करती है |
सुखिया भी बर्तन उठती है और फिर सोने चली जाती है |
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Posted by विजय-राज चौहान
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